गांव की छरहरी छोरी- Indian Virgin Girl Sex

मैं अपने गांव करीब दो वर्ष बाद गया दो वर्ष बाद जब मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर के अपने गांव गया तो मेरी मां के चेहरे पर बहुत ही खुशी थी उन्होंने मुझे देखते ही कहा प्रदीप इतने समय बाद मैं तुम्हे देख रही हूं तो बहुत अच्छा लग रहा है। मैंने अपनी मां से कहा मुझे भी तो आपसे मिलकर अच्छा लग रहा है मैंने अपनी मां से पूछा पिताजी कहां है तो मां कहने लगी वह शहर गए हुए हैं शहर हमारे गांव से ज्यादा दूर नहीं है।

मैंने अपनी मां से कहा दादी कहां है मां कहने लगी वह तो अपने कमरे में बैठे हुए हैं उन्हें अच्छे से दिखाई भी नहीं देता है। मैं जब अपनी दादी से मिला तो उन्होंने अपने चश्मे को पहनते हुए मुझे कहा क्या तुम प्रदीप हो मैंने दादी से कहा हां दादी मैं प्रदीप हूं।

दादी का प्यार देखते ही बनता मेरी मां कहने लगी कि तुम कुछ देर दादी के साथ ही बैठ जाओ जब मैं दादी के साथ बैठा तो दादी को अच्छे से सुनाई नहीं दे रहा था और ना ही उन्हें अच्छे से दिखाई दे रहा था दो वर्षों में उनके सुनने की शक्ति और देखना भी बिल्कुल कम हो चुका था। मैं जब पिताजी के आने पर उनसे मिला तो वह बड़े खुश हुए और कहने लगे प्रदीप तुम्हारी पढ़ाई तो पूरी हो चुकी है अब आगे क्या सोचा है।

मैंने पिता जी से कहा अभी तो मैंने फिलहाल कुछ नहीं सोचा है कुछ दिन तो आप लोगों के साथ ही गांव में बिताना चाहता हूं उसके बाद ही आगे सोच लूंगा। मैंने पिता जी से कहा वैसे तो मैंने अपने कॉलेज में आए हुए कंपनी में इंटरव्यू दे दिया था लेकिन अभी तक तो वहां से कोई उम्मीद ऐसे आती हुई नहीं दिखती। पिता जी कहने लगे कोई बात नहीं बेटा हो जाएगा थोड़ा धैर्य रखो सब कुछ जीवन में अच्छा ही होगा।

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मैं कुछ दिनों तक गांव में ही रहने वाला था गांव की कुछ पुरानी यादें मेरे दिमाग में भी ताजा थी। मैंने जब अपनी मां से कहा मां क्या मामा कुछ दिनों पहले यहां आए थे तो मेरी मां कहने लगी हां बेटा वह कुछ दिन पहले मुझसे मिलने के लिए आए थे काफी दिन हो गए थे वह मुझसे मिले भी नहीं थे। मां मुझसे पूछने लगी लेकिन तुम्हें किसने बताया मैंने अपनी मां से कहा मुझे रणदीप ने बताया था की पिताजी बुआ से मिलने के लिए आए थे।

मेरी मां कहने लगी कि क्या तुम्हारी अभी रणदीप से बात होती रहती है मैंने अपनी मां से कहा हां मेरी तो रणदीप से बात होती रहती है। मां कहने लगी तुम्हें मालूम है रणदीप कुछ दिनों के लिए शहर गया हुआ था और वहां पर उसका बैग किसी ने चोरी कर लिया था जिस वजह से वह काफी दिनों से परेशान भी रहा था लेकिन घर में उसने अपने पिताजी को इस बारे में नहीं बताया।

मैंने मां से कहा कि फिर इस बारे में किसने मामा जी को बताया मेरी मां कहने लगी तुम्हारे मामा जी को पुलिस स्टेशन से फोन आया था कुछ जरूरी कागजात रणदीप के बैग में रह गए थे जिस वजह से पुलिस ने तुम्हारे मामा जी को फोन किया और तुम्हारे मामा जी पुलिस स्टेशन गए थे वहां जाकर पता चला कि रणदीप का बैग चोरी हो गया था लेकिन उसने घर में किसी को नहीं बताया था।

मैंने मां से कहा लेकिन मुझे तो यह बात रणदीप ने नहीं नही बताई मां कहने लगी वह काफी परेशान था और जब शहर गया तो उसका बैग चोरी हो गया था। मैंने मां से कहा क्या वह नौकरी की तलाश में गया था तो मां कहने लगी हां बेटा वह नौकरी की तलाश में गया था लेकिन कुछ ही समय पहले वह घर लौट आया है।

मैंने मां से कहा लेकिन रणदीप को नौकरी करने की क्या आवश्यकता है मामा जी का काम भी तो वह सम्भाल सकता है। मां कहने लगी हां बेटा तुम्हारे मामा जी भी यही कह रहे थे कि वह मेरा काम भी तो संभाल सकता है लेकिन उसे तो सिर्फ शहर जाने का भूत सवार है और वह शहर में ही कुछ काम करना चाहता है। मैंने मां से कहा लेकिन यदि मामा चाहते हैं कि वह उनके साथ ही काम करे तो उसे उनके साथ ही काम करना चाहिए।

मैं और मां आपस में बात कर रहे थे तभी पिताजी हमारे पास आकर बैठे और कहने लगे प्रदीप बेटा कई बार लगता था कि तुम्हें शहर भेज कर गलती की लेकिन अब मुझे लग रहा है कि तुम्हें शहर भेज कर शायद ठीक किया तुम शहर जाकर काफी कुछ चीजें सीख चुके हो। मैंने पिता जी से कहा हां पिता जी आप ठीक कह रहे हैं मैंने शहर जाकर काफी कुछ चीजें सीखी हैं और मुझे लगता है कि जब मैं नौकरी लग जाऊं तो आपको भी मेरे साथ शहर आना चाहिए।

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पिता जी कहने लगे ठीक है यह तो हम लोग बाद में देख लेंगे लेकिन तुम फिलहाल कुछ दिन हमारे साथ ही रहो। मैं कुछ दिन अपने माता पिता के साथ ही रहने वाला था तो वह लोग भी बहुत खुश थे गांव के ही कुछ पुराने दोस्तों से मिलकर ऐसा लगता कि जैसे वह लोग मुझसे बहुत पीछे हैं।

मुझे तब इस चीज का एहसास हुआ जब मेरे पिताजी ने मुझे पढ़ने के लिए शहर भेज दिया था पहले तो मुझे लगा कि उन्होंने बहुत बड़ी गलती की लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था वह तो मेरी भलाई चाहते हैं इसलिए उन्होंने मुझे पढ़ने के लिए शहर भेज दिया था ताकि मैं अच्छे से अपनी पढ़ाई पूरी करूँ और एक अच्छी नौकरी करुं।

कुछ समय तक पिताजी ने शहर में नौकरी की लेकिन उन्हें शहर में नौकरी करना रास नहीं आया और वह गांव चले आए। गांव में ही उन्होंने खेती बाड़ी का काम संभाल लिया और अब एक छोटी सी दुकान से घर का गुजर बसर चलता है लेकिन वह उनके लिए पर्याप्त है।

मैं कुछ दिनों तक गांव में ही था तो अपने दोस्तों से रोज मिला करता हर शाम जब मैं अपने दोस्तों से मिलता तो मुझे बहुत अच्छा लगता। गांव में ही मेरा दोस्त माधव जो कि एक नंबर का शैतान है अभी भी उसकी हरकते वैसी ही हैं वह बिल्कुल भी नहीं बदला उसके पिताजी गांव में ब्याज पर पैसा दिया करते हैं।

उसके पिताजी गांव के बड़े साहूकार हैं इसीलिए तो वह अब तक नहीं सुधर पाया है वह सिर्फ अपने पिताजी के बलबूते ही अपना जीवन यापन कर रहा है। घर में वह एकलौता है इसलिए उसे किसी भी चीज की समस्या नहीं है उसके पिताजी भी उसकी हरकतों को छुपाने की कोशिश करते हैं। मैं जब माधव से मिला तो माधव से मिलकर मुझे अच्छा लगा लेकिन वह तो जैसे पहले की तरह ही था वह बिल्कुल बदला नहीं था।

वह मुझे कहने लगा प्रदीप तुम तो शहर जाकर पूरी तरीके से बदल चुके हो। मैंने उसे कहा तो शहर जाकर बदलाव तो आएंगे ही ना तुम जैसे समाज में रहोगे वैसा ही तो तुम्हें बन के रहना पड़ेगा। माधव कहने लगा भैया बिल्कुल सही कह रहे हो लगता है तुम भी शहर के हो चुके हो।

मैंने माधव से कहा ऐसा कुछ नहीं है मैं अभी गांव से जुड़ा हुआ हूं और गांव तो मैं अक्सर आता ही रहता हूं। माधव गांव में अब भी भाभियों को छेड़ा करता था और सारी भाभीया उस से परेशान रहती थी। मैंने माधव से कहा यह सब ठीक नहीं है लेकिन माधव कहां समझने वाला था उसे तो इन सब चीजों में ही मजा आता था।

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गांव की एक लड़की है उसका नाम प्रतिभा है। प्रतिभा को देखकर मुझे भी बड़ा अच्छा लगता मैं जब गांव से गया था तो उस वक्त उसने अपनी 12वीं की परीक्षा दी थी लेकिन अब उसका गदराया बदन और उसकी अदाएं देख कर मुझे वह अच्छी लगने लगी थी। मैंने माधव से कहा यार प्रतिभा तुमसे बात ही नहीं करती? माधव कहने लगा भला वह बात भी कहां से करेगी मैंने जब उसे अपनी बाहों में दबोच लिया था उसके बाद वह मुझसे दूरी बनाकर ही रखती है।

मैंने माधव से कहा यार मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है तो माधव कहने लगा लेकिन मै उससे कैसे तुम्हारी बात कैसे करवाऊ और मैं तुम्हारी मदद क्यों करूं। मैंने उसे कहा यार क्या तुम मेरे दोस्त नहीं हो तो वह कहने लगा हां तुम्हारा दोस्त हूं तो सही लेकिन मैं तुम्हारी मदद भला क्यों करूं।

मैंने उसे अपनी मदद के लिए मना ही लिया और आखिरकार वह मेरी मदद करने के लिए मान गया। जब वह मेरी मदद करने के लिए मान गया तो मैंने उसे कहा कि तुम मेरी बात प्रतिभा से करवा दो लेकिन वह तो माधव से बात करने का को तैयार नहीं थी आखिरकार मुझे ही प्रतिभा से बात करनी पड़ी।

मैंने जब उससे बात की तो वह मुझसे बातें करने लगी कुछ समय तक हम लोग एक दूसरे से चोरी छुपे मिलता रहे। मैंने माधव से कहा यार तुम मेरे और प्रतिभा के मिलने का बंदोबस्त करवा दो वह कहने लगा ठीक है मैं तुम दोनों को अकेले में मिलने का मन बंदोबस्त करवाता हूं। उसने हम दोनों का अकेले में मिलने का बंदोबस्त करवा दिया।

जब हम दोनों मिले तो उस दिन हम दोनों के होंठ एक दूसरे से टकराने लगे मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था। जिस प्रकार से मैंने प्रतिभा के होठों को अपने होठों से टकराया था वह भी मेरी बाहों में आ गई और उसका कमसिन बदन मेरी बाहों में था।

मै भी अपने आपको ना रोक सका मैं उसके स्तनों को दबाने लगा जब मैं प्रतिभा के स्तनों को दबाता तो मुझे भी बड़ा अच्छा लगता वह भी मेरा पूरा साथ दे रही थी। जैसे ही मैंने प्रतिभा के बदन से कपड़े उतारने शुरू किए तो वह शर्माने लगी आखिरकार मैंने उसके बदन से अपने कपड़े उतार दिए थे।

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उसे भी बड़ा अच्छा लग रहा था मैंने अपने लंड को प्रतिभा की चूत पर लगाया तो वह शर्माने लगी लेकिन मैंने भी उसकी चूत के अंदर धक्का देते हुए लंड को अंदर प्रवेश करवाया तो उसकी योनि से खून बाहर निकल आया। वह मुझसे कसकर लिपट गई वह मेरी बाहों में थी और मैं उसे बड़ी तेजी से धक्के मार रहा था।

उसकी योनि से लगातार खून बह रहा था वह अपने मुंह से मादक आवाज लेने लगी थी उसकी योनि की चिकनाई बढ़ने लगी थी। मैंने प्रतिमा के साथ 5 मिनट तक संभोग किया और 5 मिनट बाद मेरा वीर्य पतन हुआ तो वह उठ खड़ी हुई और कहने लगी मुझे घर जाना है। वह बड़ी तेजी से अपने घर की ओर चली गई।

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